Neetu Gupta

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*** सपने ***

जब जब तू दिखाता है सपने
मैं देखती जाती हूं
तेरे दिखाये सपनों में जैसे कहीं गुम सी हो जाती हूं
एक-एक लम्हा बीते जैसे संग सपनों के
मैं पोर-पोर उनमें इसी तरह घुलती जाती हूं
रग - रग में खूं के जैसे तू और तेरे दिखाये सपने
एक-एक मोती पिरो माला बनाती जाती हूं
फिर एक दिन न जाने क्या कैसे और क्यों होता है
बेरहम की तरह तू खुद दिखाये सपनों को रौंदता है
और मैं कभी न सिमटने के लिए बिखरती जाती हूं॥

Date : 2016-08-23 13:02:06   Like (3) Unlike (0)

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