amrit raj

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*** कहानी ***

चीखता रहा मौन...
भीतर कहीं..
सन्नाटा लील गया..
सारे शब्द..

घुटन आज़ाद हो..
कमरे में उछलती रही...
स्वछंदता..एड़ियों में ही..
ज़ब्त हो..छटपटाती रही..

ज़ख्म के होठो से रुखसारों तक..
लहरों सी बहती रही...हँसी..
आरजुओं के तकिए पे..
खुशियाँ सिसकती रही..

देह खखोरती रही...
बेचैनी.. तेज नाखुनो से..
छिलन...खरोंचे..
रूह पे उभरते रहे...
गोया..बीच कोई कार्बन रखा हो..

सुखी जमीं उम्मीदों की..
गूंगी आह के साथ...
दरारों से अट गयी..
ख्वाबो की कोपलें...
आसमां को ओर मुँह कर..
सदा को खामोश हो गई...
तलाश थी उन्हें..
गीले खुदा की..जो तरबतर करे..

पहचान..की आँखों पे..
गुमनामी की ऐनक रही..
तफ्तीश..उसकी शख्सियत की..
शहर फिर भी करता रहा..

स्याह..ढपी उस गली के..
बंद मुहाने के ठीक पहले..
मंजिल ठिठक गयी...
रास्ते...बेपरवाह अब भी..
दौड़े जा रहे...
यूँ के जैसे बूढ़ा..
किसी छोटे भरे कमरे में..
बीनता है...अपनी जिंदगी के..
आखिरी कुछ साल..
और बेखबर होता है..
उस नए दौर का पूरा मकान..उससे..

लकीरें हाथो की..दरारे मालूम होती है...
वही दरारें जो..खा जाती है पूरा का पूरा गाँव...
ख़ामोशी के निवाले संग...

सोचता हूँ..ये कहानी...
मेरी है...तुम्हारी.....
या फिर.........!!

Date : 2016-07-21 22:51:56   Like (1) Unlike (0)

About (Poetry) Say Somthink...?

Leave a Comment:

Neetu Gupta 2016-07-26 12:44:25

बेहतरीन अभिव्यक्ति

Neetu Gupta 2016-07-26 12:44:27

बेहतरीन अभिव्यक्ति